राजधानी दिल्ली में Pellet Gun Protest से जुड़ा विवाद अब अस्पतालों की मेडिकल पुष्टि के बाद और गहरा गया है। दिल्ली एम्स के जयप्रकाश नारायण एपेक्स ट्रॉमा सेंटर की छठी मंजिल पर भर्ती 19 साल के साहिल लोचप की दाईं आंख की रोशनी वापस आने की उम्मीद सिर्फ एक फीसدी बताई जा रही है, और यही घटना अब पूरे देश में चर्चा का विषय बन चुकी है।
ये भी पढ़े: पटना में छात्रों पर वाटर कैनन, आंसू गैस और लाठीचार्ज! राजभवन मार्च के दौरान हाई वोल्टेज बवाल

दो पीड़ितों की आपबीती क्या कहती है?
Pellet Gun Protest के दौरान घायल हुए साहिल लोचप दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग के छात्र हैं और नजफगढ़ के रहने वाले हैं। उनका सपना दिल्ली पुलिस में भर्ती होना था, लेकिन 2024 में पेपर लीक के चलते परीक्षा रद्द हो गई थी। इसी हताशा के साथ वे 20 जुलाई को जंतर-मंतर पहुंचे थे। उनके दोस्तों के मुताबिक, दोपहर करीब साढ़े तीन बजे कनॉट प्लेस के पास साहिल हाथ में तिरंगा लेकर सबसे आगे चल रहे थे, तभी उनके चेहरे के पास एक धमाका हुआ और वे गिर पड़े। बुरी तरह खून बहने के बावजूद उन्हें 12 घंटे तक अलग-अलग अस्पतालों में भटकना पड़ा, और तब जाकर पहली बार उनकी आंख में दवा डाली जा सकी।
दूसरे पीड़ित 25 साल के इरशाद शेख गुरुग्राम की एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हैं और वीजा के सिलसिले में दिल्ली आए थे। छात्रों का गुस्सा देखकर वे मार्च में शामिल हो गए थे। उनका कहना है कि एक रैपिड एक्शन फोर्स के जवान ने उनके सामने बंदूक तानी और ट्रिगर दबा दिया, जिससे सैकड़ों छर्रे उनके चेहरे, आंख, नाक और गर्दन में जा धंसे। गौर करने वाली बात यह है कि इरशाद घटना से ठीक एक हफ्ते पहले एक कैंसर पीड़ित बच्चे के लिए रक्तदान करने गए थे।
अस्पतालों ने क्या पुष्टि की है?
दिल्ली पुलिस भले ही Pellet Gun Protest से जुड़े दावों को फर्जी बता रही हो, लेकिन दो प्रमुख सरकारी अस्पतालों का रुख कुछ और ही कहानी बयां करता है। लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की डायरेक्टर डॉक्टर हिमानी अहलूवालिया ने पैलेट इंजरी से इनकार नहीं किया, बल्कि टिप्पणी करने से बचती नजर आईं। वहीं एम्स ट्रॉमा सेंटर के वरिष्ठ अधिकारियों ने ऑन रिकॉर्ड पुष्टि की कि साहिल के शरीर पर हाई-स्पीड छर्रों से लगी चोटें मौजूद हैं, और उनकी आंख की रोशनी बचेगी या नहीं, यह कहना अभी मुश्किल है।
इरशाद के मामले में डॉक्टरों ने चेहरे से कई छर्रे निकाले, लेकिन एक छर्रा उनकी आंख की मांसपेशी में और दूसरा गर्दन की मुख्य नस के पास फंसा है, जिसे निकालना जानलेवा भी हो सकता है। इसके अलावा एक पत्रकार और एक अन्य युवक के भी इसी तरह घायल होने की खबर है, यानी अब तक चार लोग सामने आ चुके हैं।
पैलेट गन का इतिहास और विवाद क्यों गहराया?
Pellet Gun Protest के संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि यह हथियार कितना विवादित रहा है। यह असल में 12 गेज की पंप एक्शन शॉर्ट गन है, जिसके एक कारतूस में 500 से 600 तक छोटे-छोटे छर्रे भरे होते हैं। फायर होने पर ये छर्रे बड़े दायरे में बिखर जाते हैं, जिससे निशाने के अलावा आसपास खड़े लोग भी चपेट में आ जाते हैं।
भारत में इसका इस्तेमाल पहली बार 2010 में जम्मू-कश्मीर में शुरू हुआ था, इसके बाद 2016 में बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में बड़े पैमाने पर इसका प्रयोग हुआ। इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी की एक रिसर्च के मुताबिक, 2016 में सिर्फ चार महीनों में पैलेट गन से आंखों में चोट के कारण 777 मरीज अस्पताल पहुंचे, जिनमें से 82% से ज्यादा की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई। इसी विवाद के बाद 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि भीड़ पर पैलेट गन का अंधाधुंध इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, और गृह मंत्रालय ने एक एसओपी भी बनाई थी जिसके तहत पैलेट गन का इस्तेमाल सिर्फ आखिरी विकल्प के तौर पर, वह भी कमर के नीचे निशाना साधकर किया जाना था।
अब आगे क्या हो रहा है?
Pellet Gun Protest को लेकर अब सीआरपीएफ ने आंतरिक जांच शुरू कर दी है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि किस जवान ने किस समय और किस बिंदु पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया। सूत्रों के मुताबिक गृह मंत्रालय ने सीआरपीएफ को निर्देश दिया है कि भविष्य में प्रदर्शनों के दौरान जवान पैलेट गन साथ न लेकर जाएं। हालांकि सीआरपीएफ ने अभी तक इस्तेमाल की पुष्टि या इनकार, दोनों में से कुछ भी औपचारिक रूप से नहीं कहा है।
फिलहाल स्थिति यह है कि अस्पतालों की मेडिकल रिपोर्ट्स और पीड़ितों की गवाही एक तरफ इशारा करती हैं, जबकि दिल्ली पुलिस का आधिकारिक रुख दूसरी तरफ। एसे में यह देखना अहम होगा कि सीआरपीएफ की जांच में क्या निष्कर्ष सामने आता है, और क्या पीड़ित छात्रों को इंसाफ मिल पाता है।





