उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित Mohammad Ali Jauhar University एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। विश्वविद्यालय की 38 इमारतों को गिराने के आदेश पर फिलहाल अस्थायी रोक लगा दी गई है। यह राहत विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से दायर अपील पर मिली है। हालांकि, मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और अगली सुनवाई में यह तय होगा कि ध्वस्तीकरण का आदेश बरकरार रहेगा या उसे रद्द किया जाएगा।
यह विवाद केवल अवैध निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ शिक्षा, हजारों छात्रों का भविष्य, प्रशासनिक कार्रवाई और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी जुड़ गए हैं।

कमिश्नर ने फिलहाल लगाई रोक
27 जुलाई को मुरादाबाद मंडल के आयुक्त आंजनेय कुमार सिंह ने रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) द्वारा जारी ध्वस्तीकरण आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी।
यह रोक विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा दायर अपील पर लगाई गई है। इसका मतलब है कि फिलहाल विश्वविद्यालय की 38 इमारतों पर कोई बुलडोजर कार्रवाई नहीं होगी। हालांकि यह केवल अंतरिम राहत है और अंतिम फैसला अभी आना बाकी है।
RDA ने क्यों दिया था ध्वस्तीकरण का आदेश?
इससे पहले 15 जुलाई को रामपुर विकास प्राधिकरण ने विश्वविद्यालय परिसर की 40 में से 38 इमारतों को अवैध निर्माण बताते हुए उन्हें गिराने का आदेश जारी किया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक विश्वविद्यालय प्रशासन को इन इमारतों को स्वयं हटाने के लिए 15 दिन का समय दिया गया था।
ध्यान देने वाली बात यह है कि इस कार्रवाई से मेडिकल कॉलेज और अकादमिक ब्लॉक को बाहर रखा गया था। बाकी अधिकांश भवनों को ध्वस्तीकरण आदेश के दायरे में शामिल किया गया।
प्रशासन का क्या कहना है?
रामपुर के जिलाधिकारी एवं RDA के उपाध्यक्ष अजय द्विवेदी के अनुसार जिन 38 इमारतों को गिराने का आदेश दिया गया है, उनके निर्माण के लिए आवश्यक मानचित्र (Building Plan) स्वीकृत नहीं कराए गए थे।
प्रशासन का यह भी दावा है कि जिस भूमि पर विश्वविद्यालय का निर्माण हुआ, उसका लैंड यूज़ कृषि (Agricultural Land) से संस्थागत उपयोग में विधिवत परिवर्तित नहीं कराया गया था। प्रशासन का कहना है कि विश्वविद्यालय को अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त अवसर दिए गए थे, लेकिन आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी नहीं की गईं।
विश्वविद्यालय प्रशासन की दलील
दूसरी ओर Mohammad Ali Jauhar University प्रशासन इन आरोपों से सहमत नहीं है। विश्वविद्यालय का कहना है कि जिस सिंघनखेड़ा गांव में परिसर स्थित है, वह वर्ष 2004 के अंत तक रामपुर विकास प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था।

विश्वविद्यालय प्रशासन का दावा है कि उस समय इमारतों के निर्माण के लिए आवश्यक मंजूरी जिला पंचायत और संबंधित स्थानीय निकायों से ली गई थी। इसलिए वर्तमान में RDA द्वारा अवैध निर्माण का आरोप लगाना उचित नहीं है। यही तर्क विश्वविद्यालय ने अपनी अपील में भी रखा है, जिस पर फिलहाल अंतरिम राहत मिली है।
छात्रों ने किया था विरोध प्रदर्शन
The Hindu की रिपोर्ट के मुताबिक, 18 जुलाई को विश्वविद्यालय के छात्रों और कर्मचारियों ने प्रस्तावित ध्वस्तीकरण कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन किया था। प्रदर्शनकारियों ने रामपुर के जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपते हुए कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की थी।
छात्रों का कहना था कि यदि बड़ी संख्या में इमारतें गिरा दी गईं तो उनकी पढ़ाई, परीक्षाएं, डिग्री और भविष्य पर सीधा असर पड़ेगा। वहीं विश्वविद्यालय में कार्यरत कर्मचारियों को भी रोजगार खोने का खतरा पैदा हो सकता है।
विश्वविद्यालय में कितने छात्र पढ़ते हैं?
The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, Mohammad Ali Jauhar University में वर्तमान में लगभग 2,400 छात्र अध्ययन कर रहे हैं। विश्वविद्यालय में करीब 40 पाठ्यक्रम और डिप्लोमा कार्यक्रम संचालित होते हैं।
यहां निम्नलिखित प्रमुख संकाय मौजूद हैं—
- साइंस
- लॉ (कानून)
- ह्यूमैनिटीज
- कॉमर्स
- इस्लामिक स्टडीज
- एजुकेशन
- एग्रीकल्चर साइंस
- फार्मेसी
इनके अलावा कुल 14 फैकल्टी संचालित की जा रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में लगभग एक-तिहाई छात्राएं हैं और बड़ी संख्या में हिंदू छात्र भी यहां शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

राजनीतिक विवाद भी बना मुद्दा
यह विवाद अब केवल भवन निर्माण नियमों तक सीमित नहीं रह गया है। सरकार और प्रशासन इसे पूरी तरह निर्माण नियमों के उल्लंघन का मामला बता रहे हैं।
वहीं विपक्ष का आरोप है कि यह कार्रवाई समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान और उनके द्वारा स्थापित अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान को निशाना बनाने की कोशिश है। इसी कारण यह मामला कानूनी होने के साथ-साथ राजनीतिक बहस का विषय भी बन गया है।
विश्वविद्यालय पहले भी रहा है विवादों में
यह पहला अवसर नहीं है जब Mohammad Ali Jauhar University सुर्खियों में आई है। India Today की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 में विश्वविद्यालय परिसर से कथित तौर पर मदरसा आलिया की चोरी हुई पुस्तकों के मिलने का मामला भी सामने आया था।
इसके अलावा अक्टूबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय ट्रस्ट को लीज पर दी गई 3.24 एकड़ भूमि की लीज रद्द करने के सरकारी फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद भी विश्वविद्यालय से जुड़े कई कानूनी विवाद जारी रहे।
विश्वविद्यालय का इतिहास
विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार Mohammad Ali Jauhar University की स्थापना 2006 में समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कानून के तहत की गई थी।
हालांकि यहां नियमित शैक्षणिक गतिविधियां 2012 से शुरू हो सकीं। विश्वविद्यालय का संचालन मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट करता है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान इसके संस्थापक (Founder) और लाइफटाइम चांसलर हैं।
विश्वविद्यालय का नाम स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार और खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेता मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर रखा गया है। इसे अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का दर्जा भी प्राप्त है। फिलहाल विश्वविद्यालय को बड़ी राहत मिली है क्योंकि 38 इमारतों पर प्रस्तावित बुलडोजर कार्रवाई अगली सुनवाई तक टाल दी गई है। लेकिन कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।
अब अगली सुनवाई में यह तय होगा कि रामपुर विकास प्राधिकरण का ध्वस्तीकरण आदेश बरकरार रहेगा या विश्वविद्यालय की अपील स्वीकार करते हुए उसे रद्द किया जाएगा। इस फैसले का असर केवल विश्वविद्यालय प्रशासन पर ही नहीं बल्कि वहां पढ़ रहे हजारों छात्रों, कर्मचारियों और पूरे संस्थान के भविष्य पर भी पड़ सकता है। इसलिए इस मामले की अगली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।





