भारतीय शेयर बाजार में 8 जुलाई को जोरदार बिकवाली देखने को मिली। दिनभर चली गिरावट के बाद Stock Market Crash ने निवेशकों को बड़ा झटका दिया। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में 2 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई, जबकि बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) में सूचीबद्ध कंपनियों के बाजार पूंजीकरण में करीब ₹8 लाख करोड़ की कमी आ गई।
विशेषज्ञों के अनुसार इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump का वह बयान रहा, जिसमें उन्होंने कहा कि उनके अनुसार ईरान के साथ हुआ अंतरिम युद्धविराम अब समाप्त हो चुका है। इस बयान के बाद पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की आशंका तेज हो गई, जिसका असर दुनिया भर के वित्तीय बाजारों पर दिखाई दिया।
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ट्रंप के बयान के बाद क्यों टूटा बाजार?
बाजार में गिरावट की शुरुआत उस समय तेज हुई जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की आशंकाओं के बीच निवेशकों ने जोखिम वाले निवेश से दूरी बनानी शुरू कर दी। दिन के अंत में BSE SENSEX 1,067 अंकों की गिरावट के साथ 76,503 पर बंद हुआ, जबकि NIFTY 50 517 अंक टूटकर 23,882 के स्तर पर पहुंच गया। गिरावट केवल चुनिंदा कंपनियों तक सीमित नहीं रही। बैंकिंग, एफएमसीजी, ऑयल एंड गैस समेत अधिकांश सेक्टर दबाव में रहे। इससे साफ संकेत मिला कि निवेशकों में व्यापक स्तर पर चिंता का माहौल बन गया था।
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ सप्ताह से बाजार में सकारात्मक माहौल था। कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, विदेशी निवेशकों की वापसी और कंपनियों के बेहतर तिमाही नतीजों की उम्मीद से निवेशकों का भरोसा बढ़ा था। लेकिन ट्रंप के बयान के बाद भू-राजनीतिक जोखिम अचानक बढ़ गया और बाजार की दिशा बदल गई।
कच्चे तेल की कीमतों ने क्यों बढ़ाई चिंता?
Stock Market Crash की एक बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी भी रही। रिपोर्टों के अनुसार ब्रेंट क्रूड में लगभग 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और कीमतें करीब 76 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 80 से 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है, महंगाई पर दबाव बन सकता है और कंपनियों की लागत में भी इजाफा हो सकता है। इसी कारण बाजार में उन सेक्टरों पर ज्यादा दबाव देखने को मिला, जिनका खर्च ईंधन पर अधिक निर्भर करता है या जिनका सीधा संबंध घरेलू उपभोग से है।

कुछ दिन पहले केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री Hardeep Singh Puri ने भी कहा था कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लगातार दो से तीन महीने तक कम बनी रहती हैं, तभी उसका लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचने की संभावना बनती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि इसकी कोई निश्चित गारंटी नहीं है।
अब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच तेल की कीमतों को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई है।
वैश्विक बाजारों और AI सेक्टर का भी पड़ा असर
भारतीय बाजार की कमजोरी की वजह केवल पश्चिम एशिया का तनाव नहीं रहा। अमेरिकी शेयर बाजार में टेक्नोलॉजी कंपनियों के शेयरों में आई गिरावट का असर भी एशियाई बाजारों तक पहुंचा।
रिपोर्टों के अनुसार चीन का एआई स्टार्टअप DeepSeek अपना स्वयं का एआई चिप विकसित करने पर काम कर रहा है। इस खबर के बाद निवेशकों ने सेमीकंडक्टर और एआई इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों में भविष्य के निवेश को लेकर चिंता जताई। इसी दौरान अमेरिकी चिप निर्माता कंपनियों के शेयरों में गिरावट आई, जिसका असर दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों पर भी पड़ा।
दूसरी ओर Samsung Electronics ने अप्रैल-जून तिमाही के लिए मजबूत मुनाफे का अनुमान जारी किया। इसके बावजूद निवेशकों ने भविष्य की मांग को लेकर सतर्क रुख अपनाया और मुनाफावसूली शुरू कर दी। इसका असर कंपनी के शेयरों के साथ-साथ पूरे टेक सेक्टर पर दिखाई दिया।
आगे बाजार की चाल किन बातों पर निर्भर करेगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में Stock Market Crash से उबरने या गिरावट बढ़ने का फैसला मुख्य रूप से तीन कारकों पर निर्भर करेगा। पहला, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव किस दिशा में जाता है। यदि भू-राजनीतिक स्थिति और बिगड़ती है तो बाजार पर दबाव बना रह सकता है।
दूसरा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का रुख। यदि तेल लगातार महंगा होता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था और कंपनियों की लागत पर असर पड़ सकता है। तीसरा, अप्रैल से जून तिमाही के कॉर्पोरेट नतीजे। यदि कंपनियों के वित्तीय परिणाम उम्मीद से बेहतर रहते हैं तो निवेशकों का भरोसा लौट सकता है।
हालांकि इस बीच एक राहत की बात यह भी रही कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने हाल के महीनों की बिकवाली के बाद भारतीय बाजार में फिर से खरीदारी शुरू की है। इससे संकेत मिलता है कि लंबी अवधि के निवेशकों का भरोसा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
फिलहाल वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर बाजार की नजर बनी हुई है। निवेशकों के लिए आने वाले कुछ दिन बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं, क्योंकि इन्हीं घटनाओं के आधार पर भारतीय शेयर बाजार की अगली दिशा तय हो सकती है।





