देश में E20 Petrol को लेकर लगातार बहस जारी है। सरकार पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने की नीति को तेजी से आगे बढ़ा रही है, लेकिन आम उपभोक्ताओं के मन में एक सवाल लगातार उठ रहा है कि जब पेट्रोल में देश में तैयार होने वाला एथेनॉल मिलाया जा रहा है तो इसकी कीमत कम क्यों नहीं हुई? इतना ही नहीं, सरकार स्वयं स्वीकार कर चुकी है कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से कई वाहनों का माइलेज सामान्य पेट्रोल की तुलना में लगभग 3 से 5 प्रतिशत तक कम हो सकता है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब उपभोक्ता को न कीमत में राहत मिल रही है और न माइलेज में फायदा, तो फिर सरकार E20 पर इतना जोर क्यों दे रही है? हाल ही में पेट्रोलियम मंत्रालय ने इस मुद्दे पर विस्तार से अपनी स्थिति स्पष्ट की है।

सरकार ने क्या कहा, E20 Petrol का असली उद्देश्य क्या है?
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार E20 Petrol का उद्देश्य पेट्रोल की कीमत कम करना नहीं है। सरकार का कहना है कि इस नीति का सबसे बड़ा लक्ष्य भारत की कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाना और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के असर को कम करना है।
सरकार का तर्क है कि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में यदि पेट्रोल में अधिक मात्रा में देश में निर्मित एथेनॉल का उपयोग किया जाता है तो कच्चे तेल का आयात कम होगा, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और वैश्विक संकट के समय ईंधन आपूर्ति पर दबाव भी कम पड़ेगा।
यानी सरकार E20 को उपभोक्ताओं के लिए सस्ता ईंधन नहीं, बल्कि देश की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का हिस्सा मानती है।
क्या एथेनॉल सचमुच पेट्रोल से सस्ता है?
E20 Petrol को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यही रही है कि एथेनॉल पेट्रोल से सस्ता होता होगा। लेकिन उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार ऐसा नहीं है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पंजाब सरकार के पूर्व विशेष मुख्य सचिव रहे सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी K. B. S. Sidhu ने बताया कि तेल कंपनियां अलग-अलग स्रोतों से बनने वाले एथेनॉल के लिए लगभग ₹65 से ₹72 प्रति लीटर तक भुगतान करती हैं। दूसरी ओर टैक्स से पहले रिफाइनरी स्तर पर पेट्रोल की कीमत लगभग ₹53 प्रति लीटर बताई गई है।
यानी खरीद लागत के आधार पर देखा जाए तो एथेनॉल पेट्रोल से सस्ता नहीं, बल्कि कई मामलों में अधिक महंगा पड़ता है।

सरकार के अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ) दस्तावेज में भी कहा गया है कि E20 तैयार करने की लागत अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत पर निर्भर करती है। यदि कच्चे तेल की कीमत लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है, तो E20 की लागत सामान्य पेट्रोल के बराबर या उससे अधिक हो सकती है।
सरकार का कहना है कि वास्तविक आर्थिक लाभ तब अधिक दिखाई देता है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 120 से 130 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर पहुंच जाती है।
सरकार जिस ₹1.97 लाख करोड़ की बचत का दावा करती है, उसका गणित क्या है?
सरकार का दावा है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम की वजह से भारत को बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करने की आवश्यकता नहीं पड़ी, जिससे लगभग ₹1.97 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा बची।
हालांकि K. B. S. Sidhu का कहना है कि यह आंकड़ा वास्तविक शुद्ध (नेट) बचत नहीं, बल्कि संभावित आयात लागत का अनुमान है। उनके अनुसार इस गणना में यह शामिल नहीं है कि एथेनॉल खरीदने पर कितना खर्च हुआ, उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कितनी सब्सिडी दी गई, बिजली और पानी पर कितना व्यय हुआ तथा एथेनॉल मिश्रित ईंधन से जुड़े अन्य खर्च कितने रहे।
विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक बचत का आकलन तभी संभव है जब आयात से बची राशि में से एथेनॉल उत्पादन, खरीद और उससे जुड़ी सभी लागतों को घटाकर देखा जाए।
आम उपभोक्ता और देश—किसे कितना फायदा?
E20 Petrol को लेकर दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो एथेनॉल मिश्रण से कच्चे तेल का आयात घट सकता है, विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है। यही कारण है कि सरकार इस नीति को रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानती है।
लेकिन उपभोक्ताओं के नजरिए से तस्वीर अलग दिखाई देती है। वर्तमान परिस्थितियों में E20 तैयार करना सस्ता नहीं है, कई वाहनों में माइलेज थोड़ा कम हो सकता है और पेट्रोल की खुदरा कीमत में भी कोई प्रत्यक्ष राहत नहीं मिली है। यही वजह है कि इस नीति को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि E20 से माइलेज कम मिलता है तो इसकी कीमत तय करते समय इस पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए। बताया जाता है कि अतीत में NITI Aayog ने भी इस दिशा में सुझाव दिए थे।
फिलहाल सरकार का जोर E20 कार्यक्रम को आगे बढ़ाने पर है, जबकि उपभोक्ता इसकी लागत, माइलेज और कीमत के बीच संतुलन की मांग कर रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार इस नीति में ऐसे बदलाव करती है, जिससे राष्ट्रीय हितों के साथ-साथ आम उपभोक्ताओं को भी प्रत्यक्ष लाभ मिल सके।





