बजट 2026–27 आ चुका है और इस बार एक ऐसा ऐलान हुआ है जो सीधे भारत की टेक्नोलॉजिकल, डिफेंस और ग्रीन एनर्जी भविष्य से जुड़ता है। केंद्रीय बजट में देश के चार राज्यों—ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु—में Rare Earth Minerals Corridor India बनाने की घोषणा की गई है। यह सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि चीन की मोनोपोली को चुनौती देने और भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन में मजबूत खिलाड़ी बनाने की कोशिश है।
लेकिन सवाल ये है कि आखिर रेयर अर्थ मिनरल्स होते क्या हैं, चीन इनके दम पर दुनिया को आंखें क्यों दिखाता है, और क्यों अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तक ग्रीनलैंड पर नजरें गड़ाए बैठे रहे? और सबसे अहम—भारत के लिए ये मिनरल्स इतने जरूरी क्यों हैं?

Budget 2026 में क्या कहा गया है Rare Earth Minerals Corridor को लेकर
बजट के मुताबिक ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में रेयर अर्थ मिनरल कॉरिडोर बनाए जाएंगे। इन कॉरिडोर्स में माइनिंग, प्रोसेसिंग, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग—चारों पर एक साथ फोकस होगा। रोड, रेल और बंदरगाहों से जुड़ा ऐसा नेटवर्क तैयार किया जाएगा जिससे रेयर अर्थ की पूरी वैल्यू चेन तेज और किफायती बन सके।
सरकार पहले ही 2025 में इस सेक्टर के लिए ₹7000 करोड़ की स्कीम का ऐलान कर चुकी है। Budget 2026 में यह साफ हो गया है कि सरकार अब सिर्फ कच्चा माल निकालने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि प्रोसेसिंग और हाई-एंड मैन्युफैक्चरिंग में भी भारत को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है।
आखिर Rare Earth Minerals होते क्या हैं
नाम में “रेयर” यानी दुर्लभ जरूर है, लेकिन हकीकत में ये धरती पर बहुत ज्यादा मात्रा में मौजूद हैं। Rare Earth Minerals असल में 17 धातुओं का एक ग्रुप हैं, जिन्हें टेक्नोलॉजी की रीढ़ कहा जाता है। इन्हें दुर्लभ इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये किसी एक जगह ज्यादा मात्रा में नहीं मिलते और इनका extraction और separation बेहद मुश्किल और महंगा होता है।
कई बार ये दूसरे कंपाउंड्स के साथ मिले होते हैं, जिससे इन्हें अलग करना टेक्नोलॉजी और खर्च—दोनों के लिहाज से चुनौती बन जाता है। इसी वजह से इनका इस्तेमाल महंगा पड़ता है, लेकिन फिर भी पूरी दुनिया इनके पीछे लगी हुई है।
दुनिया Rare Earth Minerals के पीछे क्यों भाग रही है
इसका सीधा जवाब है—Modern Technology।
चाहे:
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ग्रीन एनर्जी
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इलेक्ट्रिक व्हीकल
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डिफेंस इक्विपमेंट
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मेडिकल डिवाइसेज
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स्मार्टफोन और डिजिटल स्क्रीन
इन सभी में Rare Earth Minerals का इस्तेमाल होता है। सिल्वर, सफेद या ग्रे रंग के ये एलिमेंट्स:
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बेहद स्ट्रॉन्ग मैग्नेटिक प्रॉपर्टी रखते हैं
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हाई इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी देते हैं
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एनर्जी को एब्जॉर्ब कर लाइट एमिट कर सकते हैं
यही वजह है कि इन्हें Future Technology Minerals भी कहा जाता है।
China Rare Earth Dominance: पूरी दुनिया क्यों टिकी है बीजिंग पर
रेयर अर्थ मिनरल्स की बात हो और चीन का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। चीन के पास:
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दुनिया के करीब 40% रेयर अर्थ रिज़र्व
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60% से ज्यादा माइनिंग शेयर
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और लगभग 90% रिफाइनिंग क्षमता
इसी ताकत के दम पर चीन अमेरिका समेत पूरी दुनिया पर दबाव बना पाता है। भारत के लिए भी यही सबसे बड़ी चुनौती रही है। जब चीन लद्दाख या अरुणाचल जैसे मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाता है, तो भारत के लिए उसे उसी भाषा में जवाब देना मुश्किल हो जाता है क्योंकि टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन में हम उसी पर निर्भर हैं।

India Rare Earth Minerals: संसाधन हैं, इस्तेमाल नहीं
पूरी दुनिया के रेयर अर्थ मिनरल्स का करीब 8% हिस्सा भारत के पास है। इसके बावजूद भारत का माइनिंग शेयर 1% से भी कम है। इसका बड़ा कारण है प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी।
भारत के तटीय इलाकों में एक खास रेत पाई जाती है जिसे मोनाजाइट सैंड कहा जाता है। इसी रेत में न्यूक्लियर फ्यूल थोरियम के साथ-साथ रेयर अर्थ मिनरल्स भी मिलते हैं। जिन चार राज्यों में कॉरिडोर बनाने का फैसला हुआ है, वहां इनकी मात्रा सबसे ज्यादा है।
EV और ग्रीन एनर्जी के लिए क्यों जरूरी है Rare Earth Corridor India
TWI ग्रुप के डायरेक्टर डॉ. उत्तम सिंघल के मुताबिक इलेक्ट्रिक व्हीकल इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है और इसमें रेयर अर्थ मिनरल्स की भूमिका बेहद अहम है। EV की कुल कीमत का 30–40% हिस्सा सिर्फ बैटरी का होता है, और इन बैटरियों के लिए जरूरी मिनरल्स फिलहाल चीन से आयात करने पड़ते हैं।
रॉयटर्स की कस्टम्स डाटा आधारित रिपोर्ट के अनुसार 2024–25 में भारत के कुल रेयर अर्थ इंपोर्ट का 90% हिस्सा चीन से आया। यानी एक तरफ बॉयकॉट की बातें और दूसरी तरफ भारी-भरकम इंपोर्ट बिल—यही विरोधाभास भारत को कमजोर बनाता है।
भारत क्यों पिछड़ रहा है प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग में
एक बड़ी वजह है फाइनेंशियल और पॉलिसी सपोर्ट। चीन मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सस्ता लोन देता है। नाइजीरिया जैसे देश प्रोसेसिंग में आगे इसलिए हैं क्योंकि उन्हें ब्रिटेन जैसी जगहों से फंडिंग मिलती है।
भारत के पास इनोवेशन और टैलेंट है, लेकिन इंक्यूबेशन स्टेज के बाद सपोर्ट धीमा पड़ जाता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि सरकार को सीड फंडिंग के साथ-साथ फ्लेक्सिबल पॉलिसी और नई टेक्नोलॉजी अपनाने वाले यंग प्रोफेशनल्स को आगे लाने की जरूरत है।
Environmental और Social Risks: सबसे बड़ा सवाल
Rare Earth Minerals Corridor India जितना जरूरी है, उतना ही संवेदनशील भी। इलाहाबाद के मोतीलाल नेहरू नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की एक रिसर्च में केरल के कोल्लम इलाके में मिट्टी और पानी में गंभीर contamination पाई गई है। वहां थोरियम और यूरेनियम की वजह से पहले से ही बैकग्राउंड रेडिएशन मौजूद है।
रेयर अर्थ माइनिंग के दौरान:
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टॉप सॉइल कई मीटर गहराई तक हटाई जाती है
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केमिकल्स का इस्तेमाल होता है
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लीचिंग के जरिए ये केमिकल्स ग्राउंड वाटर में मिल सकते हैं
इससे न सिर्फ इंसानी सेहत पर असर पड़ता है, बल्कि इकोसिस्टम और बायोडायवर्सिटी भी खतरे में पड़ जाती है। चीन और मलेशिया पहले ही इसका खामियाजा भुगत चुके हैं। मलेशिया के क्वंतन इलाके में तो रेयर अर्थ इंडस्ट्री के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए।
भारत में जिन चार राज्यों में कॉरिडोर बनने हैं, वे पहले से ही पर्यावरणीय दबाव झेल रहे हैं। केरल में वेस्टर्न घाट, तमिलनाडु के तटीय इलाके, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के आदिवासी क्षेत्र—हर जगह सामाजिक और पर्यावरणीय चिंताएं मौजूद हैं।
विकास बनाम संरक्षण: भारत के सामने दोहरी चुनौती
Rare Earth Minerals Corridor India के साथ भारत दो बड़ी उम्मीदें एक साथ उठा रहा है।
पहली—ग्रीन फ्यूचर और टेक्नोलॉजिकल आत्मनिर्भरता।
दूसरी—यह सुनिश्चित करना कि इस विकास की कीमत पर्यावरण, आदिवासी समुदायों और स्थानीय लोगों को न चुकानी पड़े।
कॉरिडोर की पूरी डिटेल्स आना अभी बाकी है। लेकिन साफ है कि अगर सही प्लानिंग, सख्त पर्यावरणीय मानक और स्थानीय भागीदारी नहीं हुई, तो यह मौका चुनौती में बदल सकता है।
Rare Earth Minerals Corridor India भारत के लिए एक स्ट्रैटेजिक टर्निंग पॉइंट हो सकता है। यह चीन पर निर्भरता कम करने, EV और ग्रीन एनर्जी सेक्टर को मजबूती देने और भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन में अहम खिलाड़ी बनाने का रास्ता खोलता है। लेकिन यह रास्ता तभी टिकाऊ होगा जब विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन साधा जाए।
अब जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि समाज और नागरिकों की भी है कि वे सवाल पूछें और यह सुनिश्चित करें कि भविष्य की टेक्नोलॉजी किसी की जमीन, जंगल और जिंदगी कुर्बान करके न बने।





