Mayawati: उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों Mayawati फिर से चर्चा में हैं। कभी सपा और कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन करने वाली बहनजी अब बीजेपी की तारीफों के पुल बांध रही हैं। सवाल उठ रहा है कि बीएसपी की लड़ाई सत्ता पक्ष से है या विपक्ष से। Mayawati की इस नई पॉलिटिक्स ने सबको हैरान कर दिया है।
क्या Mayawati का ‘एकला चलो’ का फैसला यूपी की राजनीति के समीकरण बदल देगा?
लखनऊ में कांशीराम जी की पुण्यतिथि पर बीएसपी की रैली में Mayawati ने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। हजारों की भीड़ जुटाकर उन्होंने कहा कि अब उनकी पार्टी किसी से गठबंधन नहीं करेगी। यूपी में बीएसपी अकेले चुनाव लड़ेगी और अपने दम पर सरकार बनाएगी। लेकिन उनके भाषण में कई ऐसे बयान थे जिन्होंने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी।

उन्होंने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला। Mayawati ने कहा कि जब उनकी सरकार थी तो उन्होंने अलीगढ़ मंडल में एक नया जिला बनाया था — मान्यवर श्री कांशीराम नगर। लेकिन जैसे ही समाजवादी पार्टी सत्ता में आई, उसने उसका नाम बदल दिया। उन्होंने सवाल किया, “अगर ये इनका दोहरा चरित्र नहीं है तो क्या है?”
Mayawati ने यह भी याद दिलाया कि जब कांशीराम जी इटावा से सांसद बने थे, तब समाजवादी पार्टी के नेताओं और मुलायम सिंह यादव का सहयोग था। लेकिन अब वही पार्टी बीएसपी के खिलाफ खड़ी है। उधर, अखिलेश यादव ने भी पलटवार करते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी ने हमेशा दलितों, पिछड़ों और वंचितों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी है।
क्या अपने खिसकते जनाधार को बचाने के लिए बीजेपी का सहारा ले रही हैं Mayawati?
राजनीतिक माहौल तब और गरम हुआ जब यह खबर आई कि यूपी में दलितों, खासकर जाटव बिरादरी के वोटर अब सपा की तरफ झुकने लगे हैं। हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में 17 आरक्षित सीटों में से 7 सपा को मिलीं और उनमें से दो पर जाटव समुदाय के उम्मीदवार जीते। यह मायावती के लिए खतरे की घंटी है क्योंकि यूपी में 21% दलित वोटर हैं जिनमें से आधे जाटव हैं। गैर-जाटव वोटरों पर बीजेपी पहले ही पकड़ बना चुकी है, ऐसे में बीएसपी के लिए अपने बेस वोट को संभालना बड़ी चुनौती बन गया है।

दिलचस्प बात यह है कि अपने भाषण में मायावती ने बीजेपी की राज्य सरकार की तारीफ भी की। उन्होंने कहा कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने बीएसपी के आग्रह पर कांशीराम स्थल की मरम्मत के खर्च को मंजूरी दी, जो पिछली सपा सरकार ने रोक रखा था। उन्होंने इसके लिए योगी सरकार का धन्यवाद किया। इस बयान के बाद इंटरनेट मीडिया पर बहस छिड़ गई कि क्या मायावती अब बीजेपी के करीब जा रही हैं।
Mayawati के बयान, दलित वोटों का झुकाव और बीजेपी से तालमेल… क्या यूपी-बिहार में बड़े बदलाव की है तैयारी?
याद दिला दें, 2019 में बीएसपी और सपा के गठबंधन से बीएसपी को 10 सीटों का फायदा हुआ था। लेकिन अब मायावती ने साफ कर दिया है कि वो किसी भी पार्टी से हाथ नहीं मिलाएंगी। वहीं, पार्टी के भीतर भी उथल-पुथल जारी है। उन्होंने पहले अपने भतीजे Aakash Anand को राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया, फिर उन्हें प्रचार से हटा दिया।
उधर, राजनीति का मैदान केवल यूपी तक सीमित नहीं है। बिहार में भी एनडीए के भीतर सीटों के बंटवारे पर खींचतान खत्म होती दिख रही है। अमित शाह ने नित्यानंद राय को भेजकर चिराग पासवान को मनाया, और अब सीट शेयरिंग का फॉर्मूला लगभग तय हो गया है।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों की राजनीति में गर्मी बढ़ गई है। मायावती के बयान, दलित वोटरों का बदलता रुझान और बीजेपी से उनका बढ़ता तालमेल आने वाले चुनावों में बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहा है।






