प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान Magh Mela Shankaracharya dispute case ने धार्मिक आस्था, प्रशासनिक व्यवस्था और कानूनी सीमाओं के बीच टकराव की एक बड़ी तस्वीर सामने रख दी है। मौनी अमावस्या जैसे सबसे पवित्र और भीड़भाड़ वाले दिन संगम स्नान के लिए निकली स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद की पालकी को रोक दिया गया, जिसके बाद विवाद इतना बढ़ गया कि अब मामला सुप्रीम कोर्ट के आदेश, नोटिस और शंकराचार्य की मान्यता तक पहुंच चुका है।
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मौनी अमावस्या पर पालकी रोके जाने से कैसे शुरू हुआ Magh Mela Shankaracharya dispute case
Magh Mela Shankaracharya dispute case की शुरुआत मौनी अमावस्या के दिन हुई, जब स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद पालकी में सवार होकर संगम स्नान के लिए निकले थे। उस दिन प्रयागराज में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी और संगम क्षेत्र में करोड़ों लोग स्नान के लिए पहुंचे हुए थे। प्रशासन का कहना है कि स्वामी बिना पूर्व अनुमति के लगभग 200 समर्थकों के साथ पालकी और रथ लेकर संगम की ओर बढ़ रहे थे। पुलिस ने सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के मद्देनजर बैरिकेडिंग लगाकर पालकी को रोक दिया।
इसी दौरान समर्थकों द्वारा बैरिकेडिंग तोड़ने, पुलिस से धक्का-मुक्की और संगम मार्ग पर अव्यवस्था फैलने की बात सामने आई। Magh Mela Shankaracharya dispute case में प्रयागराज प्रशासन का दावा है कि यह स्थिति करीब तीन घंटे तक बनी रही, जिससे संगम रोड पर भारी भीड़ के बीच महिलाओं, बच्चों और बुजुर्ग श्रद्धालुओं को परेशानी का सामना करना पड़ा। इसी दौरान पालकी का एक हिस्सा भी टूट गया और शंकराचार्य संगम स्नान नहीं कर पाए।
नोटिस, सुप्रीम कोर्ट का आदेश और प्रशासन की दलील
Magh Mela Shankaracharya dispute case ने नया मोड़ तब लिया जब मेला अथॉरिटी ने 19 जनवरी की देर रात स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी किया और 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा। नोटिस में Supreme Court of India के 2022 के एक आदेश का हवाला दिया गया, जिसमें स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ का शंकराचार्य घोषित किए जाने पर रोक की बात कही गई थी।
मेला प्रशासन का कहना है कि जब तक यह मामला न्यायिक रूप से सुलझ नहीं जाता, तब तक किसी भी प्रकार का पट्टा अभिषेक या आधिकारिक मान्यता नहीं दी जा सकती। प्रशासन के अनुसार शिविर के बोर्ड पर खुद को शंकराचार्य लिखना सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। इसी आधार पर यह भी कहा गया कि कानूनी राय के मुताबिक स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद को जमीन आवंटन करना अदालत की अवमानना माना जा सकता है। यही तर्क Magh Mela Shankaracharya dispute case को सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि संवैधानिक और कानूनी विवाद बना देता है।

शंकराचार्य की दलील, समर्थन और राजनीतिक प्रतिक्रिया
Magh Mela Shankaracharya dispute case में स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि शंकराचार्य कौन है, यह तय करने का अधिकार न तो राज्य सरकार को है और न ही भारत के राष्ट्रपति को। उनका कहना है कि शंकराचार्य की पहचान अन्य पीठों के शंकराचार्य तय करते हैं। उन्होंने दावा किया कि शृंगेरी और द्वारका पीठ के शंकराचार्य उन्हें शंकराचार्य मानते हैं और पिछले माघ मेले में उनके साथ संगम स्नान भी कर चुके हैं।
विवाद के बीच अखिलेश यादव ने भी शंकराचार्य से फोन पर बात कर समर्थन जताया और कहा कि वह जल्द उनसे मिलने आएंगे। इस पर स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि हिंदू धर्म में जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को गंगा-यमुना में स्नान का अधिकार है, लेकिन उनसे यह अधिकार भी छीन लिया गया। Magh Mela Shankaracharya dispute case अब धार्मिक अधिकारों और प्रशासनिक नियंत्रण के बीच संघर्ष का प्रतीक बनता जा रहा है।
जांच, CCTV फुटेज और आगे की स्थिति
Magh Mela Shankaracharya dispute case को लेकर प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि पूरे घटनाक्रम की जांच की जा रही है। प्रयागराज के कमिश्नर के मुताबिक, बिना अनुमति पालकी के साथ संगम की ओर बढ़ना और बैरिकेडिंग तोड़ना सुरक्षा के लिहाज से गंभीर मामला था। Dainik Bhaskar की रिपोर्ट के अनुसार, घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है, जिसमें समर्थकों को बैरिकेडिंग तोड़ते और पुलिस के साथ धक्का-मुक्की करते देखा जा सकता है।
घटना के बाद स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद अपने शिविर के बाहर बैठ गए और कहा कि जब तक प्रशासन उन्हें ससम्मान प्रोटोकॉल के साथ संगम स्नान के लिए नहीं ले जाएगा, तब तक वे स्नान नहीं करेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी धरने पर नहीं बैठे हैं, बल्कि प्रशासन ने ही उन्हें वहां छोड़ा है। फिलहाल Magh Mela Shankaracharya dispute case धार्मिक आस्था, कानून और प्रशासनिक जिम्मेदारी के बीच एक बड़े टकराव के रूप में सामने आया है। आने वाले दिनों में नोटिस का जवाब, जांच रिपोर्ट और अदालत की भूमिका इस मामले की दिशा तय करेगी।






