Chhindwara Nagpur AES Deaths: मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और महाराष्ट्र के नागपुर जिले से आई खबर ने पूरे देश को चिंता में डाल दिया है। बीते सवा महीने में यहां 14 बच्चों की मौत हो चुकी है। सभी की उम्र 15 साल से कम थी और डॉक्टर्स को आशंका है कि मौत का कारण एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) हो सकता है। हालांकि, जांच अभी जारी है और सटीक वजह सामने नहीं आई है।
बच्चों की हालत बिगड़ने के लक्षण
डॉक्टर्स के अनुसार जब इन बच्चों को अस्पताल लाया गया, तो सभी को अचानक बहुत तेज बुखार था। कुछ ही घंटों में कई की तबीयत और बिगड़ गई। कई बच्चे भर्ती होने के 24 घंटे के अंदर बेहोश हो गए। अधिकांश की किडनी ने काम करना बंद कर दिया, जिससे पेशाब आना बंद हो गया। हालात गंभीर होने पर उन्हें डायलिसिस और वेंटिलेटर पर रखा गया, लेकिन जान नहीं बच सकी।
छिंदवाड़ा के परासिया ब्लॉक में अकेले छह बच्चों की मौत हुई है। यह ब्लॉक अब हाई अलर्ट पर है। वहीं नागपुर में भी ऐसे लक्षणों वाले कई बच्चे अभी भी अस्पतालों में भर्ती हैं।
ये भी पढ़े: Doctor Handwriting Prescription Case: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने मरीजों का अधिकार बताया साफ पर्चा

जांच में जुटी टीमें
अब तक की टेस्ट रिपोर्ट्स से किसी ज्ञात वायरल या बैक्टीरियल इंफेक्शन का पता नहीं चल सका है। इस रहस्यमयी बीमारी की गुत्थी सुलझाने के लिए पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी और नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) की विशेष टीमें भेजी गई हैं। आसपास के जिलों में भी सतर्कता बढ़ा दी गई है।
AES और Acute Encephalopathy – फर्क समझिए
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ मामलों को अब एक्यूट इंसेफेलाइटिस नहीं बल्कि एक्यूट इंसेफेलोपैथी की श्रेणी में रखा गया है। इंसेफेलाइटिस में आमतौर पर वायरस या बैक्टीरिया की वजह से दिमाग में सूजन होती है, जबकि इंसेफेलोपैथी में दिमाग पर असर जहरीले तत्वों या वातावरण में मौजूद हानिकारक चीजों से भी हो सकता है।
विशेषज्ञों की राय
गुरुग्राम स्थित मेरिंगो एशिया इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ न्यूरो एंड स्पाइन के चेयरमैन डॉ. प्रवीण गुप्ता बताते हैं कि AES को आम भाषा में चमकी बुखार कहा जाता है। इसमें अचानक तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी, दौरे पड़ना, बेहोशी, सांस लेने में तकलीफ़ और गंभीर मामलों में कोमा या लकवा जैसी स्थिति हो सकती है।
भारत में AES का सबसे बड़ा कारण जापानीज इंसेफेलाइटिस वायरस है। इसके अलावा डेंगू, हर्पीज सिंप्लेक्स, इन्फ्लुएंजा वायरस और कुछ बैक्टीरिया भी इसका कारण बन सकते हैं।
बचाव और रोकथाम
AES के लिए अभी कोई सार्वभौमिक वैक्सीन उपलब्ध नहीं है, लेकिन जापानीज इंसेफेलाइटिस वायरस से बचाने वाली वैक्सीन दी जाती है। यह टीका बच्चों को 9 महीने और 16–24 महीने की उम्र में दिया जाता है। समय पर पहचान और इलाज होने पर मरीज पूरी तरह ठीक हो सकता है, लेकिन देरी होने पर जान का खतरा बना रहता है। कई बार बचने के बाद भी दिमाग पर असर रह जाता है, जिससे मानसिक और शारीरिक विकास प्रभावित हो सकता है।
छिंदवाड़ा और नागपुर में हुई ये मौतें एक गंभीर चेतावनी हैं। जांच रिपोर्ट आने तक सटीक कारण तो स्पष्ट नहीं है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग का फोकस अब AES और Acute Encephalopathy दोनों पर है। फिलहाल, लोगों को सतर्क रहने और बच्चों में लक्षण दिखने पर तुरंत अस्पताल ले जाने की सलाह दी गई है।






