America Shutdown: अमेरिका इस वक्त एक बड़े राजनीतिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा है। संसद में अस्थाई फंडिंग बिल पास न होने की वजह से सरकारी कामकाज ठप हो गया है। लाखों कर्मचारी छुट्टी पर भेजे जा रहे हैं, कुछ को सैलरी नहीं मिलेगी और नौकरी पर भी खतरा मंडरा रहा है।
America Shutdown: शटडाउन क्या होता है?
जब अमेरिकी संसद (कांग्रेस) सरकार को आगे चलाने के लिए जरूरी फंडिंग पास नहीं कर पाती, तब सरकारी विभागों के पास खर्च करने के लिए पैसे नहीं बचते। इस स्थिति को शटडाउन (Shutdown) कहा जाता है। इसमें गैर-जरूरी विभागों के काम रोक दिए जाते हैं और केवल जरूरी सेवाएं ही जारी रहती हैं।
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क्यों हुआ शटडाउन?
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अमेरिकी संसद में 21 नवंबर तक फंडिंग जारी रखने के लिए रिपब्लिकन पार्टी की ओर से स्टॉप गैप फंडिंग बिल लाया गया।
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इस बिल को पास होने के लिए 60 वोट चाहिए थे, लेकिन रिपब्लिकन सिर्फ 55 वोट ही जुटा पाए।
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डेमोक्रेट्स ने इसका विरोध किया क्योंकि उनका मानना है कि हेल्थ केयर सब्सिडी बढ़ाई जानी चाहिए।
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रिपब्लिकन इसका विरोध कर रहे हैं।
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दोनों पार्टियों की सहमति न बनने से शटडाउन लागू करना पड़ा।
शटडाउन के असर
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लाखों कर्मचारी प्रभावित – कई कर्मचारियों को छुट्टी पर भेज दिया जाएगा, जबकि 2 लाख से ज्यादा को बिना वेतन काम करना पड़ेगा।
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नौकरी पर खतरा – ट्रंप ने संकेत दिया था कि अगर बिल पास नहीं हुआ तो कर्मचारियों की छटनी हो सकती है।
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नेशनल पार्क और म्यूजियम बंद – इन्हें चलाने के लिए पैसे न होने से आम जनता पर असर पड़ेगा।
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जरूरी सेवाएं जारी – एयर ट्रैफिक कंट्रोल, बॉर्डर सिक्योरिटी और सेना का कामकाज प्रभावित नहीं होगा।

पहले कब-कब हुआ शटडाउन?
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2018-19: 35 दिनों तक चला, अमेरिकी इतिहास का सबसे लंबा शटडाउन।
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1995-96: बिल क्लिंटन कार्यकाल में 21 दिनों तक शटडाउन।
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2013: बराक ओबामा कार्यकाल में 16 दिन तक शटडाउन।
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ट्रंप के पिछले कार्यकाल में ही 3 बार शटडाउन हो चुका है।
मौजूदा हालात
यह अमेरिका के पिछले 20 सालों में पांचवां सबसे बड़ा शटडाउन है।
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डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन दोनों एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
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लाखों कर्मचारी बिना वेतन काम करने को मजबूर होंगे।
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आर्थिक अस्थिरता का असर आने वाले हफ्तों में और बढ़ सकता है।
अमेरिका का यह शटडाउन साबित करता है कि राजनीतिक मतभेद सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इसका सीधा असर जनता और सरकारी कर्मचारियों पर पड़ता है। अब देखना होगा कि दोनों पार्टियां कब तक समझौता करती हैं और सरकारी कामकाज दोबारा पटरी पर आता है।






